शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

की-की: इंट्रो

की: ओह तुम ! यहाँ कैसे?

की: क्यूँ ! नहीं होना चाहिए था क्या !

की: अरे कैसी बातें करती है यार ! आ बैठ ना ! अच्छा बता क्या खायेगी  ! घर की बनी मठरी और नमकीन

है। वो लेगी या कुछ मीठा ! कुछ ले ले इस से पहले कि मैं तेरी ही लेने लगूँ  (हँसती है)

की: कुछ भी नहीं ! बस आज आपका दिमाग खाऊँगी।

(दोनों हँस पड़ते हैं)

की: मेरे दिमाग में तो बस्स भूसा भरा है। सारे प्रोफेसर साला यही कहते हैं। हाँ मुझे चख सकती है (आँख मारते

हुए) मैं काफी नमकीन हूँ।

की: (मुस्कुराते हुए मासूम आवाज़ के साथ बोलती है ) जानती हूँ।आप सिर्फ नमकीन ही नहीं कभी-कभी बहुत

मीठी भी हो जाती हो (फ़िर मुस्कुराती है )

की: (शरारती मुस्कराहट के साथ 'की' की आँखों में झाँकते  हुए ) अरे अभी तुमने ये मसाला चखा ही कहाँ है

जानेमन !

की: (थोड़ा सा असहज हो जाती है) हम्म

की: (मज़े लेते हुए) क्या हुआ ! डिस्टर्ब हो गयी (खिलखिला के हँस पड़ती है ) अरे डरो मत ! मैं अपने जूनियर्स

का ज्यादा शोषण नहीं करती ('की' की तरफ देख कर शरारती मुस्कराहट बिखेर देती है)

की: (अटकते हुए) न ना नहीं ..दरअसल वो बात नहीं है।

की: अरे घबरा मत ! तू तो मेरी फैवरेट है रे ! (मुस्कुराकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ी हो जाती है)

की: (उसका हाथ अपने कंधे से हटा कर अपने हाथ में ले लेती है, धीमे से उसे देखती है और फिर अचानक हाथ

को चूम लेती है। दूसरी तरफ 'की' को थोडा अजीब लगता है मगर वो सिर्फ मुस्कुराती है। 'की' थोडा और आगे

बढ़ कर अपने चेहरे को 'की' के करीब ले आती है  और 'की' के होठों की तरफ बढ़ती है, 'की' ये देख कर थोड़ा

सकपका उठती है, और खड़ी हो उठती है। दोनों ही चुपचाप और स्तब्ध से खड़े हैं )

की: तू ! ये ! (थोड़ा हैरान-परेशान होते हुए) आई मीन  तू !

की: (रुंवासी हो उठती है) माफ़ कीजियेगा ! मुझे लगा (अटकते हुए) आप भी ..दरअसल आप बहुत ज्यादा

अपनी जैसी लगी। आई ऍम ! आई ऍम रियली सॉरी (सिसकते हुए दरवाज़े की तरफ बढ़ती है)

('की' उसका हाथ पकड़ कर रोक लेती है)

की: अरे ठीक है ! कोई बात नहीं ! इधर देख मेरी तरफ ! अगर मैं तेरी जैसी नहीं तो तुझ से बहुत अलग भी तो

नहीं हूँ ना ! कुछ बदला क्या ! मुझे तो नज़र नहीं आता , तुझे आता है !

की: (चुपचाप सर झुका के सिसक रही है )

की: बस नाटक बंद कर अब। बहुत हो गया। ये ले मठरी खा। क्या याद रखेगी कि मुझ जैसी सीनियर भी मिली

थी कभी  ! खिला-पिला के तंदुरुस्त कर दूंगी तुझे भी अपनी तरह और फ़िर  तेरे घर वाले थैंक यू थैंक यू बोलते

हुए आयेंगे मेरे पास । अच्छा ये नमकीन तेरे लिए डिब्बे में बंद कर के रखी  है, रूम पर लेकर जाना और हाँ

खबरदार जो दोस्तों में बाँटी तो ! चल जा अब। नोट्स कल लेकर जाना। ढूँढ कर रखूँगी। ठीक है !

की: (चुपचाप सर हिलाते हुए, हाँ में जवाब देती है और दरवाज़ा खोल कर जाने लगती है, तभी )

की: और सुन ! तुझे तेरी 'बेस्ट फ्रेंड' ढूँढ कर देने की ज़िम्मेदारी भी मेरी है। इस हॉस्टल का सारा बायोडाटा है मेरे

पास (आँख मार कर मुस्कुराते हुए) ज्यादा रिस्क मत लिया कर बुद्धू ! कॉलेज है ये ! समझी ! (उसकी तरफ

देख कर हँसती है )

की: (मुस्कुराते हुए सर हिलाती है।दरवाज़ा खोल कर बाहर निकलती है। उसे थोड़ा अजीब लग रहा है मगर

अच्छा भी। पहली बार उसने पहल की और फिर अकेले में शर्मिंदा होते हुए हँस पड़ती है)

की: (कमरे के भीतर एक लम्बी साँस भर कर छत की तरफ घूमते हुए पँखे को टकटकी लगा कर देर तक

देखती रहती है,  अचानक सब कुछ साफ़ होकर फिर से धुंधला गया है)


शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

कॉफ़ी शॉप

की: हे ! रियली सॉरी हाँ , तुम बहुत देर से वेट कर रहे थे !

का: ओह चिल  ! नो प्रॉब्स ('की' की तरफ हाथ बढ़ाते हुए) क्या हाल हैं?

की: (मुस्कुरा कर हाथ मिलाती है) परफेक्ट ! तुम सुनाओ  

का: बस वही सब पुरानी ऑफिस की बातें और घर के किस्से कहानियां। अच्छा बताओ क्या पियोगी !

की: ज़रा वो मेनू पास करना ना ! (मेनू पढ़ने लगती है)

का: वैसे मेरा सुझाव है कि तुम्हे ब्राजीलियन कॉफ़ी आज़मानी चाहिए । हमेशा याद रखोगी 

की: (मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखती है, वेटर को बुलाती है और आर्डर देती है) एक दार्जिलिंग स्पेशल लेमन 

आईस  टी (का को देखते हुए) तुम ब्राजीलियन कॉफ़ी लोगे, राईट ! 

का (थोडा खिसियाते हुए): हम्म राईट 

'की' आर्डर देने में व्यस्त है। 'का', 'की' पर  नज़रें दौड़ाना शुरू करता है। 'की' की तंग शर्ट के पीछे उसके उभारों 

की नाप लेता है। उसकी लम्बी टाँगों के बारे में सोचता है। उसकी नर्म और गोरी त्वचा 'का' की आँखों में फैलने 

लगती है। भला कैसा होगा 'की' के साथ सोने का अनुभव ! काफी बोल्ड है तो शायद थोड़ी खूँखार होगी बिस्तर 

पर। ये सोचते ही 'का' के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कराहट तैर जाती है। तभी 'की' के चेहरे पर उसकी नज़र 

पड़ते ही दिमाग कुढ़ते हुए बोलता है 'ऊंह ! बड़ी रूड किस्म की है" ! हाँ मगर मज़ा तो काबू करने में ही है ना ! 

अचानक 'का' आत्मविश्वास से लबरेज़ हो उठता है । 

'का ' (एकदम खुली हुई आवाज़ के साथ ):  तो सिर्फ डांसिंग ! और  क्या करती हो वीकेंड पर ? सिंगल इंडिपेंडेंट 

मगर अकेली ज़िन्दगी तंग नहीं करती तुम्हे ?

की (एक गहरी नज़र उस पर डालती है): उम्म ! अक्सर तो नहीं मगर कभी-कभार लगता है कि कोई हो जिसके 

साथ बेपरवाह जी सको । कभी-कभी लगता है ये महानगर  'रात' को अपने भीतर ही भीतर सारा शहर निगल 

डालते हैं। जानते हो जब कभी रूममेट का खाली बिस्तर देखती हूँ, इस क़दर अकेलापन घेरता है कि  फिर सोने 

की तबियत नहीं रह जाती। उठ कर सिगरेट सुलगाते हुए हमेशा उसके धुंए में अपना अतीत ढूँढती हूँ । पूछती 

हूँ कि घर छोड़ कर आने का मकसद कितना निरर्थक हो चुका है अब। (ये कहते हुए 'की' की आवाज़, नज़रें 

और चेहरा कहीं खो जाता है)

'का' को ये बातें बड़ी अलग सी लगती हैं, उसे लगता है कि  शायद वो कुछ-कुछ समझ पा रहा है। जैसे, ऐसा 

कहीं कुछ उसके साथ भी घटित हुआ है। उसे एक अजीब सी उदासी का डर भी लगता है मगर जल्द ही वो 

इन सब बातों में जैसे सिर्फ दो ही शब्द सुनता है "रात" और 'बिस्तर'. बाकी सब बेमतलब और निराशापूर्ण है। 

'का' (अपने चेहरे पर 'की' की बातों का असर लाने की पूरी कोशिश के साथ): हम्म सच कहती हो तुम ! यहाँ तो 

बड़े शहरों में ऐसा ही है। (थोडा रुक कर)  तो अब तक क्या  अकेली ही रही हो? आई मीन, नो बॉयफ्रेंड !

की (बुझी आवाज़ में): लोगों में रिश्ते निभाने की तमीज कहाँ ! हर रिश्ता जैसे दाल-भात हो गया है। खाओ 

पियो पचाओ और अगले दिन उत्सर्जित कर दो। आह ! खैर ये सब तो चलता ही रहेगा ! आप सुनाइए कुछ 

अपने बारे में !

'का' अब तक थोडा मायूस हो गया है। कैसी मनहूस बातें कर रही है कमबख्त सुबह से। सोशल नेटवर्किंग 

प्रोफाइल में इतनी हँसती, मुस्कुराती, ललचा के पास बुलाने वाली तस्वीरें और मिलने पर किसी सेल्स गर्ल से 

ठगे होने का एहसास। 'का' थोडा उकता  कर कुछ कहना चाहता है मगर फिर एक आखिरी बार कोशिश करता

 है। 

'का': हाँ ..अब यहाँ शहरों में रिश्तों को इतनी अहमियत देने का वक़्त किसके पास है भला ! देखिये ना  सिर्फ 

साथ सोने के लिए लोग नाम भर को जुड़े हुए हैं। ठीक है कि 'सेक्स'  ज़रूरी है मगर हाँ दाल-भात नहीं होना 

चाहिए (अर्ररर  ! ये क्या कह बैठा ! संभालता है ) आई मीन ! कभी-कभी  चाहिए कोई ..जो पास बैठे ..तुम्हारे 

लिए शाम को घर का दरवाज़ा खोले। तुम्हे देख कर मुस्कुराए  (ओह माई गॉड ! ये क्या बोल रहा हूँ मैं ! मगर 

वाह ! नॉट बैड ! अच्छा बोल रहा हूँ यार !)  कोई जो थकी शामों को आपका सहारा बने और रात में (फिर 

कमबख्त गड़बड़ !) 

शुक्र है कि 'की' का फ़ोन सही वक़्त पर बजा वरना 'का' सचमुच नहीं जानता था कि वो क्या बोल रहा है ! हाँ 

मगर कमाल है ! उसमें ये प्रतिभा भी है, इसका तो उसे अंदाज़ा ही नहीं था । यार 'की' सचमुच कमाल दिखती 

है। फ़ोन पर बात करते हुए भी कितनी खूबसूरत लगती है। मगर कमबख्त कुछ ज्यादा ही दिमाग लगाती है 

हर जगह ! अरे अभी तुम्हारी उम्र ही क्या हुई है यार ! मुश्किल से कोई पच्चीस बरस की होगी  और कहाँ 

ये बुजुर्गों वाले नुस्खे ! कितना अच्छा होता कि थोडा कम सोचा करती तो अभी तक हम दोनों इस भरे-पूरे 

सन्डे को इस बेजान कॉफ़ी शॉप में नहीं बल्कि मेरे घर के बेडरूम में लिपटे हुए होते। 'का' ये सोचते सोचते 

उदास सा हो गया। 

'की' (अपना सामान समेटते हुए) :सन्डे को भी फुर्सत नहीं । चलो अब मैं निकलती हूँ। बहुत अच्छा लगा 

तुमसे मिल कर। कभी फुर्सत हो तो मेरा 'डांस परफॉरमेंस' देखने ज़रूर आना। सी यू लेटर। बाय !


'का' के दिमाग में सिर्फ 'परफॉरमेंस' अटक कर रह गया था। हाथ मिला कर मुस्कुराते हुए बाय बोला और 

फिर दूर तक जाती हुई 'की' को देखता रहा। कुछ अच्छा लगा और कुछ खराब। बता नहीं सकता क्या अच्छा 

था और क्या खराब। बस मन ही मन सोचा "इतनी बुरी भी नहीं है। कुछ ज्यादा ही डरा देती है। काश इतनी 

ईमानदार न होती ! 'की' जानती थी 'का' उसे अभी तक जाते हुए देख रहा होगा। उसका मन एक क्षण के लिए

पिघल उठा। सोचा  "ईमानदारी  और साहस अलग-अलग कितने बेजान लगते हैं। कैसा होता ! गर वो बेबाकी

से वही कहता जो कहना चाहता है। मगर अपने आप को प्रस्तुत करने का साहस किसे है !  वो अकेले सोते हुए 

थक गयी है मगर लोग अकेले जागते हुए नहीं थके !

   

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

डेट: पार्ट 2


का (फ़ोन पर नंबर डायल करता हैलाइन कट करता हैडायल करता हैफिर कट करता हैबहुत देर तक यही उपक्रम चलता है। कुछ समय बाद एक लम्बी सांस भर कर फ़ोन को एक किनारे पर रख देता है। झक मार कर दुबारा फ़ोन उठाता है। नंबर डायल करता हैऔर दूसरी तरफ से 'कीफ़ोन पर आती है)

कीहेल्लो ..हेल्लो ..हाँ मालूम है कि तुम ही हो। चलो ट्रैफिक जाम मत करो और बताओ कि  क्या सोच कर फ़ोन किया 

का ('कीका आत्मविश्वास देख कर थोडा घबरा जाता हैगला साफ़ करते हुए): वो ..दरअसल .. हाँ ! तुम घर पहुँच गयी  ठीक तरह से !

की (कुटिल मुस्कान भरी आवाज़ के साथ): मेरा ख़याल है तुम ही घर तक छोड़ कर गए थे। पाँच  दफे पीछे पलट कर मुस्कुराए थे और दस दफे हाथ हिला कर गुडबाय किया था। खैर ! इसके बावजूद मैं सही-सलामत घर पहुँच गयी हूँ (हंसने लगती है

का: (मायूस आवाज़ के साथओह ! 


का: (चुप)

की: (चुपचाप मुस्कुराती है

काअच्छा ठीक हैमैं फ़ोन रखता हूँ अब। 

की के ! बाय ! गुड नाईट 

का: (चुप)

कीक्या हुआ

का (थोडा चिढ़ते हुए): तुम क्या हमेशा मेरे मज़े लेने की फ़िराक में रहती हो ! देख कर तो इतनी बेवक़ूफ़ नहीं लगती कि  कुछ समझती ही ना हो !

की(थोडा कुढ़ते हुए): तुम क्या हमेशा से दूसरों को मुफ्त का एंटरटेनमेंट देना पसंद करते हो ! लेट मी टेल  यू कि  तुम बहुत ही घटिया एक्टिंग स्किल्स रखते हो 

का (थोडा परेशान होते हुए): क्या मतलब है इसका !  के ! आई ऍम सॉरी 

कीयस यू शुड। मैं क्या कोई फेस रीडर हूँ जो सब जान जाऊँगी  और खुलासे करने लगूंगी और हूँ भी तो क्या ठेका ले रखा है सब कुछ बोलते रहेने का ! खुद क्यूँ नहीं बोलते कुछ ! 

का (धीमी आवाज़ मेंक्या बोलूं ! (थोडा अटकते हुएजैसे तुम जानती ही नहीं।। आई मीन , तुम जानती हो कि हम क्यूँ मिले आज ! मैं ....कितना पसंद करता हूँ तुम्हें  ...पिछले एक साल से इतनी बातें की हमने मगर मैं कभी कह नहीं पाया। 

कीतो आज कैसे कह पाए !

कावो ..तुमने जब आज अचानक हाथ पकड़ा मेरा तो मुझे लगा  ... लगा कि कह देना चाहिए ...शायद तुम भी यही  सुनना चाहती हो ...देखो गलत मत समझना मुझे ! मैं  चाहता हूँ तुम्हे।  पिछले एक साल में कई दफे मैं तुम्हारे साथ चांदनी रात में समंदर किनारे चहलकदमी करने के सपने देखता हूँ ..मैं ..

कीहाँ ! मैं भी पिछले दो सालों से तुम्हारे साथ सोने के सपनें देखती हूँ . अक्सर 

का: (चौंक कर हल्ख़ के नीचे थूक गटकता है और 'कीको बीच में टोक करक्याअअआा ?

की (भरपूर मासूमियत के साथ): हाँ ! तुम्हे क्या लगा ! हर लडकी पहली डेट में ही लड़के का हाथ पकड़ कर उसके कंधे पर सर टिका कर उसकी बेवकूफियों पर हँसना चालू कर देती है ! 

काओह ! (चुपअच्छा ! (चुप के ! ह्म्म्म 

की (हँसते हुए) : लाइब्रेरी में सर झुका कर डूबे रहा करते थे तुम। बहुत बार मन हुआ कि तुम्हारे पास आकर धीमे-धीमे तुम्हारे कंधे सहला दूं। तुम्हारी चोरी से देखने की आदत से बड़ी कोफ़्त होती थी इसीलिए तुम्हे हिम्मत देनी ज़रूरी थी। तुम्हारी ज़िन्दगी में आंखिरी 'कीनहीं बनना मुझे मगर पहली "की" , ज़रूर बनना था ..यू नो ! एक चुनौती की तरह लगता हैतुम्हे किताबों से अलग कर अपनी आँखों में डुबो देना  ..और फिर आज शाम जब तुमने कहा "आपकी आँखें बहुत गहरी लगती हैंतो लगामानो कुछ अघटित सा घटित  हुआ पहली बार . जैसे ..! हेलो ! हेल्लो .. सुन रहे हो  तुम ! 

काअअ   ...हाँ सुन रहा हूँ . मगर समझ नहीं पा रहा हूँ 

की (हँसते हुए) : रिश्तों में दिमाग जितना कम लगे उतना ही बेहतर है। 

काथोड़ा अजीब है ये सब .. लगता हैजैसे आपकी चुनौती ने मेरी चुनौती को  बहुत छोटा कर दिया हैजैसे ..जैसे मुझे मेरी आदमियत से थोडा अलग कर दिया है ...मेरे लिए ये सब आसान नहीं है 

कीहाँ ! औरत की ईमानदारी को पचा पाना आसान नहीं है (हंसती हैदेखिये दिमाग  लगाइए ज्यादा। बस प्यार कीजिये। कम से कम हम लड़कियों से इतना तो सीखिए (धीमे से फ़ोन पर किस करती हैआई लव यू !

काह्म्म्म ... थोडा वक़्त दीजिये पचाने के लिए ..मेरा हाजमा इस केस में अक्सर गड़बड़ रहता है . आई लव यू टू